सूदखोरी

"बाजार की चाल"
पिछले सैंकड़ों सालों से छोटे किसान और व्यापारी अपने व्यवसाय तथा खेती के लिए गाँव के सेठ साहुकारों से कुछ रकम सीमित समय के लिए उधार लेते हैं और उसे एक निश्चित समय में किश्तों के रूप में चुकाते हैं।
वैसे तो यह 2/सैंकड़ा के ब्याज से चुकाते हैं लेकिन हर महीने प्रिंसिपल अमाउंट घटता जाता है इसलिए यह 3से4/रूपए सैंकड़ा पर पड़ता है।
आज भी ऐसा ही हो रहा है।
कई जगहों पर जैसे कि मेरे गाँव खंडेला में कुछ लोग एक दिन के लिए रकम देते हैं और 20 से 25 फीसदी की दर से वसूलते हैं।
जैसे कि पाँच हजार रुपये के बदले दूसरे दिन 5500 रुपए लेते हैं लेकिन मजदूर वर्ग तथा मजबूर लोग और कर भी क्या सकते हैं?
प्रधानमंत्री जी ने ऐसे मजबूर लोगों के लिए मुद्रा योजना चलाई है।
अधिकाधिक इसका लाभ उठाएँ।
सूदखोरों पर लगाम लगाएँ।
खंडेला के सौ लोगों में से अस्सी लोग इस बुरे चंगुल में फंसे हुए हैं। सूदखोर पैसा देते समय असल रकम में ब्याज जोड़कर मिश्रधन को ही मूलधन की तरह लिखकर उसकी किश्त बनाते हैं।
पहले दस किश्तों में भुगतान होता था आजकल कुछ लोग दस महीने का ब्याज जोड़ कर पाँच किश्तों में वसुलने लग गए हैं।
पता नहीं लोगों की इंसानियत जिंदा भी है या मर गई।
सूदखोरों के चंगुल में फंसने वाले लोगों में कई संपन्न लोग भी हैं जो व्यापार की उन्नति के लिए फंस जाते हैं।
सूदखोरों के इस व्यापार की पोल खोलने वाली मेरी पोस्ट का अगला भाग जल्दी ही, जिसमें कई चेहरे बेनकाब होंगे।
बजरंग लाल सैनी गुरु।

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