कुछ हम गुस्ताख़ हैं कुछ तुम गुस्ताख़ हो
मैं अदनी सी आँख तुम इक नफीस ख्वाब हो
कुछ खता मेरी तो कुछ खता तेरी माफ हो
चल डूबते हैं दरिया -ए-इश्क़ में गहरे
जहां आलम-ए-हुशन-ओ-इश्क़ के तवाजुन का ना हिसाब हो
मोज़ बनकर बहे मैं तेरे पास औ तू मेरे पास हो
(बजरंग लाल सैनी"बादल")
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